Women Freedom Fighters of India

कभी नहीं संघर्ष से, इतिहास हमारा हारा।
बलिदान हुए जो वीर जवां, उनको नमन हमारा।।
बिना मतलब के वीरों ने, दुर्बल को नहीं मारा।
जो शहीद हुए आज़ादी में , उनको नमन हमारा।।


भारत की आज़ादी की लड़ाई का वर्णन अधूरा रह जाएगा अगर इसमें पुरुष समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने वाले नारी समाज का ज़िक्र न किया जाये। घर की चारदीवारी में रहकर तो कभी साड़ी के पल्लू को सिर पर रखकर वीरांगाओं ने ब्रिटिश ताकत से लोहा लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। चूड़ियों वाले हाथों ने कभी तलवार उठाई है तो कभी रोटी बेलने वाले हाथों ने पिस्तौल चलाने में भी हिचक नहीं दिखाई है। भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन में भाग लेने वाली महिला सेनानियों में से कुछ नाम तो सब जानते हैं, लेकिन कुछ नाम ऐसे भी हैं,जिनके बारे में इतिहास के पन्नों में केवल कुछ शब्द ही लिखे गए हैं। आइये इनमें से कुछ नामों का परिचय जानने का प्रयास करते हैं।

झांसी की रानी -


आपने शायद ही किसी ऐसे भारतीय के बारे में सुना होगा जो झांसी की रानी के बहादुरी भरे कारनामे सुनते-सुनते न बड़ा हुआ हो। झांसी की रानी सन 1857 के विद्रोह में शामिल रहने वाली प्रमुख शख्सियत थीं। उनकी बहादुरी के चलते आज उन्हें वीरता का प्रतीक माना जाता है और उनके नाम का इस्तेमाल बहादुरी के पर्यायवाची की तरह किया जाता है।

सरोजिनी नायडू -


"भारत कोकिला" सरोजिनी नायडू एक स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं। उन्होंने साल 1905 में बंगाल विभाजन के दौरान वह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हो गईं। गोपाल कृष्‍ण गोखले से एक ऐतिहासिक मुलाकात ने उनके जीवन की दिशा बदल दी थी। उन्होंने महिला सशक्तिकरण और महिला अधिकारों के लिए आवाज उठाई। वे सविनय अवज्ञा आंदोलन में गांधी जी के साथ जेल गईं। साथ ही उन्हें 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भी 21 महीने के लिए जेल जाना पड़ा था। स्वतंत्रता के पश्चात सरोजिनी भारत की पहली महिला राज्यपाल बनीं। उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। वे एक अच्‍छी कवियत्री भी थीं।

विजयलक्ष्मी पंडित -

विजयलक्ष्मी पंडित का जन्म 18 अगस्त 1900 में ईलाहाबाद में हुआ। विजयलक्ष्मी पंडित भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बहन भी हैं। वह आजादी के दौरान 1932-1933, 1940 और 1942-43 में तीन बार जेल भी गईं। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए काफी काम किया और पहली महिला कैबिनेट मंत्री भी बनी। और 1953 में पहली भारतीय महिला यूएन जेनरल एसेंबली में शामिल होने वाली पहली एशियन महिला का खिताब भी उन्हें मिला।

बेगम हज़रत -

बेगम हज़रत महल जो अवध (अउध) की बेगम के नाम से भी प्रसिद्ध थी, अवध के नवाब वाजिद अली शाह की दूसरी पत्नी थीं। अंग्रेज़ों द्वारा कलकत्ते में अपने शौहर के निर्वासन के बाद उन्होंने लखनऊ पर क़ब्ज़ा कर लिया और अपनी अवध रियासत की हकूमत को बरक़रार रखा। अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े से अपनी रियासत बचाने के लिए उन्होंने अपने बेटे नवाबज़ादे बिरजिस क़द्र को अवध के वली (शासक) नियुक्त करने की कोशिश की थी मगर उनके शासन जल्द ही ख़त्म होने की वजह से उनकी ये कोशिश असफल रह गई। उन्होंने 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ विद्रोह किया। आखिर में उन्होंने नेपाल में शरण मिली जहां उनकी मृत्यु 1879 में हुई थी।

दुर्गावती देवी –

ब्रिटिश राज के खिलाफ ये महिला उस समय खड़ी रही जब देश में महिलाओं को घर से बाहर तक निकलने की इजाज़त नहीं थी. भगत सिंह जब ब्रिटिश ऑफिसर को मार कर भागते है, तब वे दुर्गावती के पास मदद के लिए जाते है. दुर्गावती भगत सिंह व् राजगुरु के साथ ही ट्रेन में सफ़र करती है, जहाँ दुर्गावती इन्हें ब्रिटिश पुलिस से बचाती है. दुर्गावती भगत सिंह की पत्नी बन जाती है, जिससे किसी को शक ना हो. इनके पति का नाम भगवतीचरण बोहरा था, जो भगत सिंह के साथ ही आजादी के लड़ाई में खड़े हुए थे. उनकी पार्टी के सभी लोग इन्हें दुर्गा भाभी कहा करते थे. दुर्गावती नौजवान भारत सभा की मेम्बर भी थी.

बीना दास -

क्रान्तिकारी बीना दास का जन्म 24 अगस्त, 1911 ई. को ब्रिटिश कालीन बंगाल के कृष्णानगर में हुआ था। उनके पिता बेनी माधव दास बहुत प्रसिद्ध अध्यापक थे और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भी उनके छात्र रह चुके थे। बीना की माता सरला दास भी सार्वजनिक कार्यों में बहुत रुचि लेती थीं और निराश्रित महिलाओं के लिए उन्होंने ‘पुण्याश्रम’ नामक संस्था भी बनाई थी। ब्रह्म समाज का अनुयायी यह परिवार शुरू से ही देशभक्ति से ओत-प्रोत था। इसका प्रभाव बीना दास और उनकी बड़ी बहन कल्याणी दास पर भी पड़ा। साथ ही बंकिम चन्द्र चटर्जी और मेजिनी, गेरी वाल्डी जैसे लेखकों की रचनाओं ने उनके विचारों को नई दिशा दी।

इन वीरांगनाओं के अलावा रानी सरोज गौरीहार और बीबी अजीजुल फातिमा जैसी कई अन्य महिला स्वतंत्रता सेनानी भी है जिन्होंने अपने देश को आजाद कराने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। भारत की उन सभी वीरांगनाओं को हम प्रणाम करते हैं।

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